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भोर की पहली किरण ने जब, खिड़की पर दस्तक दी थी, नींद से भारी आँखों में, सपनों की एक हद थी। कंधों पर बस्ता लटकाया, जो बोझ नहीं, पहाड़ था, बचपन अभी जीया नहीं, और सामने संसार था।
माँ ने कहा, "दौड़ना है, तुझे सबसे आगे आना है," पिता ने कहा, "नाम कमाना, जग में मान बढ़ाना है।"
वह चला तो सही स्कूल की ओर, पर मन में एक सवाल था, "क्या जीवन बस एक रेस है?"—यह कैसा मायाजाल था!
कक्षा के भीतर...
ब्लैकबोर्ड पर लिखे थे अक्षर, सफ़ेद चाक की धूल थी, "रट लो इसे, यही सत्य है"—शायद यही तो भूल थी। गुरुजी बोले, "प्रश्न मत पूछो, जो लिखा है उसे मान लो, नंबर ही तुम्हारा भविष्य हैं, इस सत्य को तुम जान लो।"
सब सिर झुकाकर रट रहे थे, तोते जैसे बोल रहे थे, अंको की उस मंडी में, अपनी कीमत तोल रहे थे।
पर वह रुका...
उस भीड़ में एक विद्यार्थी, थोड़ा अलग, थोड़ा मौन था, वह पूछ बैठा खुद से ही— "मैं डॉक्टर, इंजीनियर... पर मैं कौन था?"
किताबों के पन्ने उसे, पिंजरा-सा लगने लगे, इतिहास की तारीखों से, मुर्दे जैसे जगने लगे। उसने देखा खिड़की बाहर, एक पंछी उड़ता जाता था, बिना डिग्री, बिना बस्ते के, वह अपना गीत गाता था।
तब एक आवाज़ उठी भीतर से, जैसे कोई श्रुति जागी हो, जैसे वर्षों की नींद से, चेतना अभागी जागी हो।
आत्मबोध (The Realization)
उसने जाना— विद्या वो नहीं जो केवल, पेट भरना सिखलाती है, विद्या वो है जो मन के, हर डर को मिटाती है।
अगर डिग्री पाकर भी, मन अशांत और रोगी है, तो वो विद्वान नहीं, बस एक दुखी 'भोगी' है।
उस दिन उसने बस्ता नहीं, अपना 'अहंकार' उतारा, रटने की उस दौड़ को, उसने दिल से नकारा। अब वह पढ़ता था, पास होने को नहीं, जानने के लिए, सत्य और असत्य के भेद को, पहचानने के लिए।
निष्कर्ष
अब वह समझ गया था— विद्यार्थी का अर्थ 'भिखारी' नहीं, जो नौकरी की भीख माँगे, विद्यार्थी वह 'योद्धा' है, जो अज्ञान के तमस को लांघे।
जीवन एक प्रयोगशाला है, हर पल एक परीक्षा है, स्वयं को स्वयं से जीत लेना—बस यही 'सच्ची शिक्षा' है।
जो जलकर सोना बनता है, वही तो असली छात्र है, डिग्री तो बस कागज है, चरित्र ही असली पात्र है।
🌱 "जिज्ञासा ही जिसका धर्म है, और सत्य ही जिसका सार, वही सच्चा विद्यार्थी है, वही है असली हकदार।"
Themji Organization
& Nitesh Patel